मां शारदा की महिमा : यहाँ मिला था आल्हा को अमरता का वरदान

मां शारदा की पहली पूजा आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा की गई थी. मैहर की माँ शारदा की नगरी में हर वर्ष शारदेय नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि मेला लगता है जहाँ दूर दूर से देवी भक्त अपनी अपनी मुरादे लेकर पहुचते है ।मां शारदा की महिमा का गुड़गान करते है ।माँ शारद ही है जो कलयुग में अपने भक्त की भक्ति से प्रशन्न होकर आल्हा को अमरता का वरदान दिया था

सतना | मध्यप्रदेश के सतना जिले में स्थित मैहर धाम विश्व प्रसिद्ध है. यह मां भवानी के 51 शक्तिपीठों में से एक है. आदि शक्ति मां शारदा देवी का मंदिर, मैहर नगर के पास विंध्य पर्वत श्रेणियों के मध्य त्रिकूट पर्वत पर स्थित है.मान्यता है कि मां शारदा की पहली पूजा आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा की गई थी. मैहर की माँ शारदा की नगरी में हर वर्ष शारदेय नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि मेला लगता है जहाँ दूर दूर से देवी भक्त अपनी अपनी मुरादे लेकर पहुचते है ।मां शारदा की महिमा का गुड़गान करते है ।माँ शारद ही है जो कलयुग में अपने भक्त की भक्ति से प्रशन्न होकर आल्हा को अमरता का वरदान दिया था । कहा जाता है कि आज भी माँ शारदा की पहली पूजा आल्हा देव ही करते है ।करोना काल मे पिछले तीन मेले नही लगे मगर इस वर्ष करोना करोना प्रोटोकॉल का पालन करते हुए आम भक्तो को माँ के दिव्य दर्शन करने का मौका मिलेगा ।

आदि शक्ति मां शारदा देवी का मंदिर, मैहर नगर के समीप विंध्य पर्वत श्रेणियों के मध्य त्रिकूट पर्वत पर स्थित है. यह मां भवानी के 51 शक्तिपीठों में से एक है. ऐसी मान्यता है कि मां शारदा की प्रथम पूजा आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा की गई थी. मैहर पर्वत का नाम प्राचीन धर्म ग्रंथों में मिलता है. इसका उल्लेख भारत के अन्य पर्वतों के साथ पुराणों में भी आया है. मां शारदा देवी के दर्शन के लिए 1063 सीढ़िया चढ़कर माता के भक्तों मां के दर्शन करने जाते हैं. यहां पर प्रतिदिन हजारों दर्शनार्थी दर्शन करने आते हैं .

ऐसा माना जाता है कि दक्ष प्रजापति की पुत्री सती भगवान शिव से विवाह करना चाहती थी, लेकिन उनकी इच्छा राजा दक्ष को मंजूर नहीं थी, फिर भी माता सती अपनी जीद पर भगवान शिव से विवाह कर लिया, एक बार राजा दक्ष ने यज्ञ करवाया उस यज्ञ में ब्रह्मा विष्णु ईंद्र और अन्य देवी देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन यज्ञ में भगवान शंकर को नहीं बुलाया, यज्ञ स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित ना करने का कारण पूछा, इस पर राजा दक्ष ने भगवान शंकर को अपशब्द कहे, अपमान से दुखी होकर माता सती ने यज्ञ अग्नि कुंड में कूद कर अपने प्राणों की आहुति दे दी, भगवान शंकर को जब इस बारे में पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया, ब्रह्मांड की भलाई के लिए भगवान विष्णु ने सती के शरीर को 52 भागों में विभाजित कर दिया, जहां भी सती के अंग गिरे वहां शक्तिपीठों का निर्माण हुआ

Glory of Mother Sharda
Glory of Mother Sharda

ऐसा माना जाता है कि यहां पर भी माता सती का हार गिरा था, जिसकी वजह से मैहर का नाम पहले मां का हार अर्थात माई का हार था जो अप्रभंश होकर मैहर नाम पड़ गया, इसीलिए 52 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ मैहर माँ शारदा देवी के मंदिर को माना गया है ।त्रिकूट पर्वत की चोटी पर ये मंदिर लोगो की आस्था का क्रेंद बन चुका ।देश विदेश से यहा माई के भक्त सिर्फ एक झलक देखने हर दिन पहुचते है ।

इस मंदिर का ऐतिहासिक महत्व भी है ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर आल्हखंड के नायक आल्हा उदल दो सगे भाई मां शारदा के अनन्य उपासक थे. आल्हा उदल ने ही सबसे पहले जंगल के बीच मां शारदा देवी के इस मंदिर की खोज की थी, इसके बाद आल्हा में इस मंदिर में 12 साल तक तपस्या कर देवी को प्रसन्न किया था, माता ने उन्हें प्रसन्न होकर अमर होने का आशीर्वाद दिया था. मां शारदा मंदिर प्रांगण में स्थित फूलमती माता का मंदिर आल्हा की कुल देवी का है

नवरात्रि : नवशक्तियों से युक्त हैं और हर शक्ति का अपना-अपना अलग महत्व है

जहां विश्वास किया जाता है कि प्रतिदिवस ब्रम्ह मुहूर्त में स्वयं आल्हा द्वारा मां की पूजा अर्चना की जाती है ।मां के मंदिर के तलहटी में आज भी आल्हा देव के अवशेष है ।उनकी तलवार और खड़ाऊ आम भक्तों के दर्शन के लिए रखी गई है ।आल्हा तालाब भी है जिसमे प्रशासन ने संरक्षित किया है और सूचना बोर्ड में भी इस तालाब के एतिहासिक और धार्मिक महत्व का वर्णन है ।आल्हा ऊदल का अखाड़ा भी है।

संवाददाता नरेंद्र कुशवाहा

संवाददाता सतना न्यूज डॉट नेट

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