MP : शुभ योग में मनाई जा रही है देवशयनी एकादशी

भोपाल, 20 जुलाई । आज मंगलवार को देवशयनी एकादशी है। इसे पद्मा एकादशी, आषाढ़ी एकादशी और हरिशयनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। देवशयनी एकादशी के मौके पर इस बार शुक्ल और ब्रह्म योग बना है। ज्योतिष शास्त्र में इन योग को शुभ योगों में गिना जाता है। इस समयावधि में किए गए कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। इन योग में किए गए व्रत दान उपवास से मान सम्मान की प्राप्ति होती है।

कल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय के ज्योतिषाचार्य डॉ. मृत्युञ्जय तिवारी ने बताया कि आज आषाढ़ शुक्ल एकादशी से चातुर्मास शुरू हो रहा है। यह कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चलेगा। यह चार माह का समय हरि शयन का काल समझा जाता है। दरअसल, वर्षाकाल के इन चार महीनों का संयुक्त नाम चातुर्मास दिया गया है। चातुर्मास में जितने भी पर्व, व्रत, उपवास, साधना, आराधना, जप-तप किए जाते हैं, उनका विशाल स्वरूप एक शब्द में चातुर्मास्य कहलाता है।
उन्होंने बताया कि पुराणों में इस चौमासे का विशेष रूप से वर्णन किया गया है। भागवत में इन चार माहों की तपस्या को एक यज्ञ की संज्ञा दी गई है। वराह पुराण में इस व्रत के बारे में कुछ उदारवादी बातें भी बताई गई हैं। संभवतः यह दृष्टिकोण इसलिए समाहित किया गया होगा। क्योंकि यात्रा के दौरान किसी निश्चित स्थान पर पहुंचने में विलंब हो सकता है। उस युग में आज की तरह यात्रा के साधन नहीं थे, इसलिए यह विचार शुमार किया गया होगा। चूंकि चौमासे के व्रत में एक ही स्थान पर रहना आवश्यक है, इसलिए इस परिप्रेक्ष्य में उपरोक्त तथ्य सारगर्भित लगता है।
डॉ. तिवारी के अनुसार, शास्त्रों व पुराणों में इन चार माहों के लिए कुछ विशिष्ट नियम बताए गए हैं। इसमें चार महीनों तक अपनी रुचि व अभिष्ठानुसार नित्य व्यवहार की वस्तुएं त्यागना पड़ती हैं। कई लोग खाने में अपने सबसे प्रिय व्यंजन का इन माहों में त्याग कर देते हैं। चूंकि यह विष्णु व्रत है, इसलिए चार माहों तक सोते-जागते, उठते-बैठते ॐ नमो नारायणाय के जप की अनुशंसा की गई है।
पौराणिक कथा के अनुसार, सतयुग में मांधाता नाम का एक प्रतापी राजा रहते थे, वे प्रजापालक थे। प्रजा और अपने पुत्र में कभी भेद भाव नहीं किया। इसी कारण उनकी चर्चा तीनों लोक में थी। एक बार जब उनके राज में अकाल पड़ा गया। इसका उपाय ढूंढ़ते-ढूंढ़ते राजा मांधाता अपनी सेना के साथ वन की ओर निकल गए। वन में भटकते हुए वो अंगिरा ऋषि के आश्रम जा पहुंचे। उन्होंने अंगिरा ऋषि से अपनी समस्या के बारे में बताया।
राजा ने कहा कि हे ऋषिवर! मैं किसी प्रकार के पापकर्म में संलिप्त नहीं हूं। प्रजा की हमेशा भलाई का ही कार्य करता हूं। फिर भी जाने किस अपराध के कारण राज्य में भयावह अकाल पड़ गया है। ऋषिवर कृपा करके कोई युक्ति बताएं। तब ऋषि अंगिरा ने कहा- हे राजन! सतयुग में धर्म-कर्म का विशेष महत्व है। अगर आप अधर्मी हो जाते हैं या अंजाने में भी कोई पाप कर्म करते हैं तो आपको इस पाप कर्म दंड जरूर मिलेगा या फिर किसी प्रजाजन के द्वारा को पाप कर्म किया जा रहा हो, जिसका दण्ड सबको भुगताना पड़ रहा है।
ऋषि अंगिरा ने राजा मांधाता को देवशयनी एकादशी के व्रत रखने का परामर्श दिया और कहा कि इस एकादशी का व्रत करने से समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। भगवान विष्णु की कृपा से सभी कष्ट दूर होते हैं। ऋषि अंगिरा के वचनानुसार राजा मांधाता ने देवशयनी एकादशी का व्रत रखा, फलस्वरूप उनके राज्य में बारिश हुई और प्रजा को अकाल से मुक्ति मिली।

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