मुर्दा शहर के जिंदा लोग

मुर्दा शहर के जिंदा लोग अकारण ही शोर नही मचाते है …. इतिहास गवाह है कि तमाम आलोचनाओं के बावजूद भी हमारे देश मे लाशों पर राजनीति होती आई है मालुम हो कि गांधी जी की मौत से लेकर इंदिरा गांधी ललित नारायण मिश्र दीनदयाल उपाध्याय राजीवगांधी जैसे बड़े नेताओं की मौत पर भी जमकर राजनीति हुई थी और गाहे बगाहे अब भी होती रहती है

बाद मे गोधरा कांड . सोनभद्र हत्या कांड और माब लिंचिंग जैसी घटनाओं मे हुई मौतो को लेकर भी खूब सियासी बयान बाजी हुई थी यह लाशों पर की जाने वाली राजनीति का ही हिस्सा थी

भुखमरी बेरोजगारी और किसानो की मौत पर भी राजनीतिक रोटियां सेंकी गई है यहां लाशो पर की गई राजनीति की कुछ घटनाओं का जिक्र कर रहा हूं ताकि यह समझा जा सके कि आखिर लाशों को राजनैतिक प्रपंच मे क्यों घसीटा जाता है

आईये कुछ पुरानी घटनाओं पर नेताओं की बयानबाजी पर गौर फरमाईये ….

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कभी भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा पर निशाना साधते हुये सोनभद्र हत्याकांड के पीड़ित परिवारों के साथ सहानुभूति दिखाने का ढोंग करने का आरोप लगाते हुये कहा था कि वे लाशो पर राजनीति कर रही हैं।

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इस तरह से जहां बीजेपी ने कांग्रेस पर लाशों पर राजनीति करने का आरोप लगाया तो वहीं
उत्तर प्रदेश मे विधानसभा के नेता राम गोविंद चौधरी ने विवादित बयान देते हुये केंद्र और यूपी की भाजपा सरकार को कोरोना वायरस से भी अधिक खतरनाक बताया

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राम गोविंद चौधरी ने भाजपा पर ”लाशों पर राजनीति” करने का आरोप लगाते हुये
कहा था कि भाजपा ने ही लाशों पर राजनीति करने की शुरुआत गुजरात से की है

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अमृतसर से लोकसभा के सांसद गुरजीत सिंह औजला ने शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल को माझे में जहरीली शराब से हुई मौतों पर राजनीति बंद करने की सलाह दी थी यहां आकालीदल पर लाशों पर राजनीति करने का इल्जाम था

कहने का तात्पर्य यह है कि सियासी फायदे के लिये जब तब लाशों पर राजनीति होती आई है और अब उसी एक कड़ी मे वालीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर भी राजनीति हो रही है । इस ताजा घटना क्रम मे जहां महाराष्ट्र की गठवंधन सरकार हमलावर है वहीं बीजेपी पर्दे के पीछे से सरकार को घेरने मे लगी हुई है

फिलहाल सुशांत की मौत के मामले मे गर्माई सियासत मे कंगना रानौत को आगे करके शिवसेना को पछाड़ने के लिये बीजेपी कंगना का उसी तरह से इस्तेमाल कर रही है जैसा कि कभी सोनिया और राहुल गांधी को घेरने के लिये स्मृति ईरानी का इस्तेमाल बीजेपी ने किया था

कभी कभी तो ऐसा लगता है मानो जैसे कि कोरोना संक्रमण काल मे देश की फुरसतिया राजनैतिक विरादरी के पास बस अब यही एक जरूरी काम रह गया है …

डेस्क रिपोर्ट

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