एक रूपये का जुर्माना यानि कि औकात बोध …

एक रूपया का जुर्माना भी भला कोई जुर्माना होता है ? लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़े नामी गिरामी वकील प्रशांत भूषण को औकात बोध कराते हुये अवमानना मामले मे फकत एक रूपये के जुर्माने की सजा सुनाई है

लोग बतलाते हैं कि बडे व्यक्तियों के द्वारा किये गये छुद्र कार्यौ के लिये तुच्छ जुर्माने की सजा सुनाये जाने की परंपरा यहां रही है जनश्रुतियों के मुताबिक कभी रीवा राजघराने के महाराजा गुलाब सिंह ने राजा की बराबरी करने के अपराध मे जबलपुर के सेठ गोकुलदास जी को कुछ कौड़ियो के जुर्माने की सजा सुनाई थी कहतें है कि तब सेठ गोकुल दास ने जुर्माने की मामूली राशि के ऐवज मे रीवा से जबलपुर तक चांदी की सड़क बनवा देने की पेशकश की थी मगर राजा ने उन्हे औकात वोध कराते हुये कुछ कोड़ियों के जुर्माने की सजा को बरकरार रखा था अब यह किस्सा सच्चा है या नही यह तो पता नही परंतु इन्ही सेठ गोकुल दास जी ने हाई कोर्ट के लिये फकत एक रूपये के किराये पर अपना महलनुमा भवन मध्यप्रदेश सरकार को दे दिया था जबलपुर हाईकोर्ट की विल्डिंग सेठ गोकुलदास की ही मिल्कियत थी

बहरहाल यहां औकात बोध नही बल्कि उदारता का भाव था परंतु अनेक ऐसे प्रसंग हैं जहां औकात बोध कराने के लिये बेहद मामूली सजा सुनाई ग ई है प्रशांत भूषण के मामले मे भी सजा कम और औकात बोध का मसला ज्यादा नजर आता है

डेस्क रिपोर्ट

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