एमपी : 2 किलोमीटर दूर खड़ी थी जिंदगी की एंबुलेंस लेकिन आधे रास्ते में टूट गई सांसे

सियाबती का इलाज चल रहा था, बुधवार की सुबह ही उसे बाइक से डाक्टर के पास ले गया था। शाम को अचानक फिर से तबियत बिगड़ी। मुख्य सडक़ तक पहुंचते-पहुंचते मेरे गोद में ही उसकी मृत्यु हो गई। यदि समय से गांव में एंबुलेंस पहुंच जाता और मेरे घर तक एंबुलेंस पहुंचने के लिए सडक़ होती तो शायद सियाबती जिंदा होती। सियावती अपने पीछे दो लड़कियां और एक आठ महीने के बालक को रोते-बिलखते छोड़ गई है।

जिंदगी की एंबुलेंस

अनूपपुर, 30 सितंबर । प्रदेश में विलुप्त हो रहे बैगा जनजातीय समुदाय को संरक्षित करने शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन में विभागीय अधिकारियों की अनदेखी से अब यह समुदाय सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ती नजर आ रही है। ऐसी ही अमानवीय तस्वीर जैतहरी जनपद अंतर्गत ग्राम पंचायत डोंगराटोला के ग्राम तुम्मीवर से सामने आई, जहां बुधवार 29 सितम्बर की रात बैगा परिवार की महिला सियावती की मौत इलाज के लिए घर से दो किलोमीटर दूर मुख्य मार्ग पर खड़ी एम्बुलेंस वाहन तक लाने के दौरान खेत के पगडंडी पर परिजनों की गोद में हो गई। महिला आधे रास्ते का सफर भी तय नहीं किया था। लेकिन सडक़ के अभाव में समय पर एंबुलेंस वाहन की सुविधा नहीं मिलने से महिला की मौत हो गई।

ग्रामीणों ने बताया कि तुम्मीवर में 98 प्रतिशत आबादी संरक्षित बैगा आदिवासी परिवार निवासरत है। गांव के आदिवासी परिवार ज्यादा शिक्षित और जागरूक नहीं हैं। गांव में बिजली, पानी, सडक़ की सुविधा नहीं है। स्वच्छता को लेकर जागरूक करने वाला पूरा तंत्र भी निष्किय है। जिसके कारण यहां अशुद्ध पेयजल सहित अन्य संक्रमण के कारण ग्रामीण अक्सर किसी न किसी बीमारी की चपेट कर मौत की नींद सो रहे हैं। यहां आजादी के 75 वर्ष बाद भी गांव के लिए अब तक सडक़ पहुंच मार्ग नहीं बन सकी है। जिस कारण ग्रामीण खेत की मेड़ से होकर आवागमन करते हैं।

इसमें बुधवार की रात महिला की तबीयत बिगडऩे पर परिजन उसे कांधे पर उठाकर मुख्य सडक़ तक ले जाने का प्रयास कर रहे थे। सडक़ के अभाव में एम्बुलेंस वाहन दो किलेामीटर दूर मुख्य मार्ग पर खड़ी थी, लेकिन मुख्य मार्ग तक पहुंचने से पूर्व महिला की मौत हो गई। गांव में सडक़ नहीं होने से इस गांव के लोगो का संपर्क अन्य गांवों से टूटा रहता है।

एक माह से बीमार महिला थी, नहीं पहुंच पाई एम्बुलेंस

ग्राम तुम्मीवर निवासी 37 वर्षीय सियाबती बैगा पिछले एक महीने से बीमार थी। शरीर में सूजन की शिकायत थी। मंगलवार देर रात तबियत ज्यादा खराब होने पर परिजनों ने एंबुलेंस बुलाया। लेकिन एंबुलेंस को गांव तक पहुंचने में एक घंटा से ज्यादा का वक्त लगा, लेकिन गांव तक आने के लिए पहुंच मार्ग नहीं होने के कारण वाहन मुख्य मार्ग पर खड़ी होकर परिजनों के आने का इंतजार करने लगी। सियाबती बैगा का पति सियालाल बैगा और उसकी ननद बीमार महिला को गोद में उठाकर मुख्य सडक़ खड़ी एम्बुलेंस वाहन तक ले जाने का प्रयास करने लगे। लेकिन आधे रास्ते में ही सियाबती ने दम तोड़ दिया।

प्रस्तावित सडक़ योजना फाइलों में अटकी

ग्रामीणों ने बताया कि जिस सडक़ के नही होने से महिला की मौत हुई है, उस सडक़ की स्वीकृति होने के बावजूद उसका निर्माण कार्य आरम्भ नहीं किया जा सका है। प्रदेश खाद्य मंत्री के द्वारा ग्रामीणों के निवेदन पर ग्रामीण सुदूर संपर्क योजना के तहत दो सडक़ निर्माण के लिए विभाग को निर्देशित किया गया था। जिसके बाद सीईओ जैतहरी द्वारा इन दोनों सडक़ को स्वीकृत करने का अनुमोदन जिपं कार्यालय को भेजा गया था। कई महीने बीत जाने के बाद भी यह सडक़ पत्राचार में ही उलझ कर रह गई है।

सडक़ रहती तो बच सकती थी जान

मृतिका सियाबती के पति सियालाल ने बताया कि सियाबती का इलाज चल रहा था, बुधवार की सुबह ही उसे बाइक से डाक्टर के पास ले गया था। शाम को अचानक फिर से तबियत बिगड़ी। मुख्य सडक़ तक पहुंचते-पहुंचते मेरे गोद में ही उसकी मृत्यु हो गई। यदि समय से गांव में एंबुलेंस पहुंच जाता और मेरे घर तक एंबुलेंस पहुंचने के लिए सडक़ होती तो शायद सियाबती जिंदा होती। सियावती अपने पीछे दो लड़कियां और एक आठ महीने के बालक को रोते-बिलखते छोड़ गई है।

पुष्पेंद्र पांडे सचिव ग्राम पंचायत डोंगराटोला जैतहरी ने बताया किमहिला की तबीयत ज्यादा खराब थी। सडक़ के अभाव में ग्रामीण खेतों के बीच पगडंडी के सहारे आवागमन करते हैं। सडक़ निर्माण का अनुमोदन जिपंचायत से नहीं होने की वजह से अब तक यह कार्य शुरू नहीं हो पाया है।

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डेस्क रिपोर्ट

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