MP के उपचुनाव में दलित फैक्टर….मायावती से मोहभंग अब दलित मोदी के संग

राजनैतिक गप शप …. 2018 मे किसने किसे हराया था ? बीजेपी को कांग्रेस ने हराया था या फिर सिंधियां ने शिवराज को उन दिनो बीजेपी संघटन द्वारा जारी चुनावी विज्ञापनों मे जोर देकर एक बात कही जा रही थी .. माफ करो महाराज हमारे तो शिवराज लेकिन हुआ उल्टा ग्वालियर संभाग की सोलह सीटों पर शिवराज के लोग ही साफ हो गये थे परंतु 2019 के आम चुनावों मे सिंधिया ब्रिगेड को भी मुंहखी खानी पड़ी थी खुद सिंधिया लोक सभा का चुनाव हार गये थे

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इस तरह से जहां एक तरफ शिवराज सत्ता से बाहर हो गये थे वहीं लोक सभा का चुनाव हार जाने के के महाराज भी राजनीति मे अप्रसांगिक हो चले थे । लेकिन महाराज के पाला बदलते ही शिवराज और महाराज के दिन फिर आये परंतु बीजेपी के क ई निष्ठावान कार्यकर्ताओं का राजनैतिक भविष्य चौपट हो गया जयभान सिंह पवैया दीपक जोशी और प्रभात झा सरीखे नेताओं को हासिये पर डाल दिया गया है

बहरहाल अब देखना यह है कि ग्वालियर संभाग की सोलह सीटों पर कमल खिलता है या फिर कमलनाथ का झंडा लहराता है दर असल मध्यप्रदेश के उपचुनाव मे लड़ाई पार्टी बनाम पार्टी की नही बल्कि व्यक्ति बनाम व्यक्ति हो ग ई है एक तरफ वह दो व्यक्ति है 2018 मे जिनका नाम आगे करके चुनाव लड़े गये थे

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बीजेपी शिवराज की अगुवाई मे चुनाव लड़ रही थी तो कांग्रेस सिंधियां को संभावित सी एम का चेहरा बतलाकर मैदान मे थी 2018 के विधान सभा के चुनावो मे पार्टी की खराब स्थिति के चलते चुनाव प्रचार के लिये मोदी जी को भी ग्वालियर बुलाया गया था लेकिन शिवराज सरकार के खिलाफ उपजी नाराजगी के कारण यहां बीजेपी बुरी तरह से पिछड ग ई थी उसकी पार्टी के चार बड़े धुरंधर नेता भी चुनाव हार गये थे तब कांग्रेस की जीत का सेहरा सिंधियां के सर पर बंधा था

लेकिन 2019 मे जब सिंधिया खुद चुनाव हार गये तब कांग्रेस के दो क्षत्रपो कमल नाथ और दिग्गी ने यह कहना शुरू कर दिया था कि ग्वालियर स़भाग मे कांग्रेस को मिली कामयाबी मे सिंधिया का कोई बड़ा योगदान नही था यद्यपि उनका ऐसा सोचना तब गलत सावित हो गया जब महराज के सभी समर्थक विधायक कांग्रेस को धता बताकर बीजेपी की गोद मे जाकर बैठ गये ।

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इस तरह अब सियासी समर मे जहां एक तरफ सूबे के सी एम शिवराज और महाराज साथ साथ है तो वहीं दूसरी तरफ अकेले कमलनाथ है फिलहाल उप चुनावो की तारीखों के ऐलान से पहले जनहित से जुड़े मुद्दो पर बहस कम हो रही है जबकि वायदा खिलाफी और गद्दारी की चर्चा कुछ ज्यादा ही की जा रही है

जहाँ तक ग्वालियर और चंबल के इलाके मे जातीय समीकरण का सवाल है तो वह अभी बीजेपी के पक्ष मे नजर आता है जानकारो की माने तो यहां का दलित समाज बीजेपी के पाले मे खड़ा है राजनैतिक पंडितो का कहना है कि खैरात की भरपूर खुराक मिलने की वजह से 2019 के आम चुनावों मे मोदी के साथ जाने वाला दलित समाज अब बीजेपी का एक बड़ा वोट बैंक बन चुका है ।

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आगे अब जहां तक असरदार व्यक्तियों का सवाल है तो इस लिहाज से बीजेपी ज्यादा ताकतवर दिखती है लेकिन यदि 2018 मे शिवराज सरकार के खिलाफ उपजी एंटीइनकंबेंसी अभी तक बनी हुई तो कांग्रेस को ज्यादा नुकसान नही होगा है ….

डेस्क रिपोर्ट

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