हर दस्तखत अपनी कीमत वसूलता है ..

मध्यप्रदेश मे घूंस की अराजकता का आलम यह हो गया है कि यहां का हर एक हुक्मरान बे खटके अपने दस्तखत की कीमत वसूलता है दर असल मंजूरी और अनुमति की खातिर हुजूर के दस्तखतों की जरूरत पड़ती है और इसके लिये आपको हर उस दस्तखत की कीमत अदा करनी पड़ती है जिसके लिये सरकार ने व्यवस्था के नाम पर नियम कानून बनाये हुये है

मसलन वाहन चलाने के लिये सरकार ने डायव्हिंग लाईसेंस का कानून बनाया है अब यदि इस नियम के पालन के लिये आपको लाईसेंस लेना होगा तो आपको शासकीय शुल्क के साथ साथ परिवहन अधिकारी के दस्तखत की कीमत भी चुकानी पड़ेगी ….. इसी तरह से भवन अनुज्ञा . सीमांंकन बंटवारा और न्यायालयीन फैसलो के क्रियान्वयन तक के लिये आपको हुजूर के दस्तखत की कीमत अदा करनी पड़ती है

कहने का तात्पर्य यह है कि अब तो नियम कायदों के पालन तक मे घूंस वसूली जा रही है और कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे कि महज घूंस खाने के लिये ही नियम कायदे बनाये जाते हो

घूंस की इस अराजक स्थिति के लिये आखिर जिम्मेदार कौन है ?

वरिष्ठ पत्रकार पंडित जयराम शुक्ल ने कहा कि राजनीति का एकमात्र आकर्षण करप्शन है इसलिये कोई भी राजनैतिक दल करप्शन के विरूद्ध बड़ी और प्रभावी कार्यवाही नही करता है महंगे हो चुके चुनावों के लिये पैसे उन्ही अधिकारियों से लिये जाते है जो अपने दस्तखत की भरपूर कीमत वसूलते है इस तरह लोकतंत्र की कोंख से बहने वाली भ्रष्टाचार की इस गंगोत्री मे सभी डुबकी लगा रहे है

 

जबकि शहर से प्रकाशित समाचार पत्र पत्रिका के ख्यातिलब्ध युवा पत्रकार रमाशंकर शर्मा जी ने कहा कि घूंस की अराजक स्थिति के लिये पूरा सिस्टम ही जिम्मेदार है रमाशंकर शर्मा ने कहा कि जनप्रतिनिधियों को इस ओर ध्यान देना चाहिये मगर दुर्भाग्य से वे भी भ्रष्ट व्यवस्था का हिस्सा बने हुये है जिसके चलते नियम कायदो के पालन तक मे घूंस लग रही है आगे उन्होने कहा कि निः संदेह सूबे मे भ्रष्टाचार की अराजक स्थित है लेकिन उपचुनावों मे यह बड़ा मुद्दा नही है

डेस्क रिपोर्ट

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