पिक्चर अभी बाकि है, तेरा क्या होगा …

25 विधायकों के द्वारा कांग्रस का साथ छोड़ देने के बाद सत्ता गवां चुकी कांग्रेस के पास अब खोने के लिये ज्यादा कुछ बचा नही है मगर यदि उपचुनावों मे कांग्रेस अप्रत्याशित तौर पर बड़ी कामयाबी हासिल करने मे कामयाब हो जाती है तब जहां सिंधिया की लोकप्रियता और उनकी प्रतिष्ठा को आघात पहुंचेगा वहीं शिवराज का तो पूरा का पूरा राजनैतिक कैरियर ही खतरे मे पड़ जायेगा …..

हालांकि राजनैतिक पंडित इस तरह की किसी भी संभावना से इंकार करते है परंतु साथ ही साथ वे यह भी स्वीकार करते हैं कि यदि उपचुनावों के नतीजे अपेक्षा के मुताबिक नही आये तो सक्रिय राजनीति से शिवराज की विदाई लगभग तय है

दर असल इसकी एक वजह यह बतलाई ग ई कि दो हजार अठारह के विधानसभा के चुनावों मे मोदी जी की भारी लोकप्रियता के बावजूद शिवराज दम तोड़ रही कांग्रेस को हरा पाने मे सफल नही हुये थे और दूसरी वजह यह है कि बार बार शिवराज को महत्व दिये जाने को लेकर भी दल के दूसरे बड़े नेताओं मे असंतोष पनप रहा है

सूत्रों की माने तो 2019 मे नेता प्रतिपक्ष की दौड़ से शिवराज को बाहर कर पार्टी ने उनके विकल्प की तलाश भी शुरू कर दी थी
और तब नरेंद्र सिंह तोमर . नरोत्तम मिश्रा गोपाल भार्गव व कैलाश विजयवर्गीय जैसे नेताओं को शिवराज के बेहतर विकल्प के तौर पर देखा भी जाने लगा था

मगर इसी बीच शिवराज के निशाने पर रहे कांग्रेसी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की बीजेपी मे अचानक धमाकेदार एंट्री हो जाती है और इस तरह प्रदेश मे 15 माह पुरानी कमलनाथ की सरकार गिर जाती है

राजनैतिक घटनाक्रम तेजी से बदलने लगता है सिंधिया समर्थकों के अलावा कांग्रेस के कुछ और विधायक भी पार्टी छोड़कर बीजेपी मे चले आते है ।

इस तरह मध्यप्रदेश मे एक बार पुनः 1967 की कहानी दोहरा दी जाती है बस फर्क इतना रहता है कि तब पार्टी से बगावत करने वाले कांग्रेसी नेता गोविंद नारायण सिंह को मुख्यम़ंत्री बनाया गया था और अब बगावत का विगुल फूंकने वाले कांग्रसी नेता ज्योतिरा दित्य सिंधिया को महज राज्य सभा की सांसदी से संतोष करना पड़ रहा है

अब यह सवाल उठना लाजिमी है कि पार्टी हाईकमान 2018 मे चुनाव ना जिता पाने वाले शिवराज को चौथी बार मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने के लिये क्यों राजी हो गई और वह भी तब जब ज्योतिरादित्य के बीजेपी मे आ जाने के बाद मध्यप्रदेश मे भाजपा की राजनीति मे एक बडे बदलाव की शुरूआत साफ नजर आ रही है

कहतें हैं कि सिंधिया की एंट्री के बाद प्रभात झा . दीपक जोशी . जयभान सिंह पवैया .रूस्तम सिंह जैसे पुराने पार्टी के वफादार नेता हासिये पर चले गये है और एक बड़ी सियासी हैसियत के साथ प्रदेश की राजनीति मे सिंधिया स्थापित भी हो गये है ।

इसलिये राजनैतिक पंडितो का कहना है कि सिंधियां केवल कमलनाथ के लिये ही खतरनाक सावित नही हुये है बल्कि निकट भविष्य मे सिंधिया और उनके समर्थक शिवराज के लिये भी बड़े संकट के कारण बनेंगे …

डेस्क रिपोर्ट

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