पितरों को नाराज करती हैं श्राद्ध पक्ष के दौरान की गई ये mistakes, रखें इनका ध्यान

पितृ पक्ष चल रहा है जो 10 सितंबर (10 september) से शुरू हुआ और हिंदू कैलेंडर के अनुसार 25 सितंबर तक चलेगा। पितृ पक्ष के इन 16 दिनों में, श्राद्ध संस्कार किए जाते हैं और पिंडदान, तर्पण, दान, ब्राह्मण भोजन (brahmin food) और पितरों को पंचबली अर्पित की जाती है। ऐसा माना जाता है कि पितृ पक्ष, पितृ गण देवलोक से पृथ्वी पर आते हैं और अपने बच्चों को खुश और समृद्ध होने का आशीर्वाद (Blessings) देते हैं। ऐसे में पितृपक्ष के इन दिनों पूरे नियमों (rules) के साथ श्राद्ध संस्कार (Secrament) किया जाता है.इन दिनों आप किसी भी प्रकार की गलती करने से बचें ताकि पितरों को गुस्सा न आए। जी हां, पितृत्व के दौरान कही और की जाने वाली बहुत सी बातें हैं जो नहीं करनी चाहिए। आइए जानते हैं इनके बारे में

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चांदी के बर्तन में भोजन

शास्त्रों में कहा गया है कि पिता को अपनी क्षमता के अनुसार चांदी (Silver) के बर्तन का प्रयोग करना चाहिए। सभी बर्तन नहीं तो चांदी के गिलास में कम से कम पानी तो देना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि अपने पितरों को चांदी के बर्तन में जल देने से पितरों की अनंत तृप्ति होती है। यदि भोजन पात्र चांदी का बना हो तो यह उत्तम माना जाता है।

श्राद्ध का अन्न

श्राद्ध में मिर्च, मांस, बैंगन, प्याज, लहसुन, बासी भोजन, सफेद तिल, मूली, लौकी, काला नमक, सत्तू, जीरा, दाल, सरसों, चना आदि वर्जित माने गए हैं। अगर कोई इसका इस्तेमाल करने की कोशिश करता है तो पूर्वजों को गुस्सा आता है। यह स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

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भोजन परोसने के नियम

पितृसत्ताओं की मान्यता है कि श्राद्ध संस्कार (Secrament) के दौरान ब्राह्मण भोजन करते समय दोनों हाथों से परोसने वाले बर्तन को ले जाते हैं, एक हाथ में रखे बर्तन से परोसा गया भोजन असुरों को जाता है।

नास्तिकता और साधुओं का अपमान ना करें

एक व्यक्ति जो नास्तिक बन जाता है और धर्म और ऋषियों का अपमान करना चाहता है, अपने पिता का मजाक उड़ाता है, उसके पिता को गुस्सा आता है। यदि आप नास्तिक हैं या श्राद्ध कर्म में विश्वास नहीं करते हैं, तो अपने आप को रखें, किसी का अपमान न करें।

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दूसरे की भू‍मि पर न करें श्राद्ध

पितरों के लिए पितरों का श्राद्ध सदैव अपने घर या अपनी भूमि में ही करना चाहिए। अन्य लोगों की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए। वनों, पहाड़ों, मंदिरों  को दूसरों की भूमि नहीं माना जाता है क्योंकि वे किसी के स्वामित्व में नहीं माने जाते हैं। इसलिए इन स्थानों पर श्राद्ध किया जा सकता है।

श्राद्ध करने के नियम

पुत्र पिता की पूजा करता है। पुत्र की अनुपस्थिति में पत्नी को श्राद्ध करना चाहिए। एक सच्चा भाई अपनी पत्नी की अनुपस्थिति (Absence) में श्राद्ध कर सकता है। यदि एक से अधिक पुत्र हों तो बड़े पुत्र को श्राद्ध करना चाहिए। उपरोक्त नियमों के अनुसार श्राद्ध न करने पर पितरों को क्रोध आता है। कई घरों में बड़ा पुत्र होने पर भी छोटा पुत्र श्राद्ध करता है। छोटा पुत्र अलग रहता हो तो भी सभी को एक स्थान पर एकत्रित होकर श्राद्ध देना चाहिए।

श्राद्ध का समय

श्राद्ध के लिए उत्तम समय मध्याह्न कुटुप काल और रोहिणी काल है। कुटप काल में किया गया दान अक्षय फल देता है। सुबह और रात के समय किया जाए तो पितरों को कष्ट होता है। रात्रि में कभी भी श्राद्ध न करें, क्योंकि रात्रि राक्षसों का समय है। दोनों शाम को भी श्राद्ध कर्म नहीं किया जाता है।

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श्राद्ध में इनको भी जरूर बुलाएं

श्राद्ध संस्कार के संबंध में शास्त्रों के नियम यह भी कहते हैं कि जो लोग ब्राह्मणों के अलावा एक ही शहर में रहने वाली अपनी बहनों, साले और भतीजों को पैतृक श्राद्ध में आमंत्रित नहीं करते हैं, उन्हें श्राद्ध भोजन करने की अनुमति नहीं है। उनके द्वारा किया गया।

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इन बातों का भी रखें ध्यान

श्राद्ध के दौरान शराब पीना या मांसाहारी भोजन करना वर्जित है। बदला खाने में लहसुन और प्याज को गिनना चाहता है। इसलिए पितृपक्ष के दौरान लहसुन और प्याज से परहेज करना चाहिए। पिता झूठ बोलकर और व्यापारिक हित में भी नाराज होता है।इस क्रिया को करना न भूलें।

श्राद्ध में पिता घरेलू कलह, स्त्री का अपमान, बच्चों की प्रताड़ना के कारण गुस्से में निकल जाता है। श्राद्ध के दौरान मांगलिक कार्य नहीं किया जाता है। जैसे विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, शुभता आदि। मान्यता के अनुसार 16 श्राद्धों में बाल और नाखून भी नहीं काटने चाहिए। इससे हमारे पूर्वज हमसे नाराज हो सकते हैं।

Article By Sipha

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