गलती से छपा डाक टिकट हो गया बेशकीमती

Accidentally printed postage stamp became valuable

प्रयागराज । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, हम सबके प्यारे बापू। उनकी स्मृतियां अनमोल हैं। उनकी मृत्यु के बाद स्मृति में छापे गए डाक टिकट (स्टांप) को सरकारी उपयोग में लाने के लिए सर्विस शब्द मुद्रित कर दिया गया। यह छोटी सी गलती बाद में मूल्यवान हो गई। जिनके पास मानवीय गलती वाले ऐसे टिकट हैं, वह खुद को धन्य मानते हैं आज।

 बापू के नाम व चित्र वाले स्टांप उनकी मृत्यु से पहले ही इंडिया सिक्योरिटी प्रेस नासिक में छापने की प्रक्रिया चल रही थी। जब 30 जनवरी को दिल्ली में उनकी हत्या हुई तो इसमें तेजी लाई गई। डाक टिकट संग्रहक (फिलैटलिस्ट) एम. गुलरेज बताते हैं कि स्मृति में जो पहला डाक टिकट मुद्रित हुआ उसे इंडिया सिक्योरिटी प्रेस नासिक की बजाय स्विस प्रकाशक हेलियो कर्वाइजर सा. लाचौक्स डी फांंड्स से छपवाया गया। भारत सरकार ने इसकी सहमति दी थी। नई-नई आजादी मिली थी और व्यवस्थाएं धीरे-धीरे पटरी पर आ रही थीं। डाक टिकट जल्दी मुद्रित कराना था। यह स्टांप 15 अगस्त 1948 को स्वाधीनता की पहली वर्षगांठ पर जारी किया गया। कीमत थी 10 रुपये। जिस दौर में आना, दो आना प्रचलन में था,यह बहुत बड़ी रकम थी।

यह हुई थी टिकट में गलती एम गुलरेज बताते हैं कि स्मृति में स्टांप को सरकारी उपयोग में लाने के लिए उस पर अंग्रेजी में सर्विस शब्द मुद्रित हो गया था। शासकीय उपयोग वाले टिकट पर सर्विस शब्द लिखा जाता है जबकि जनसामान्य के उपयोग वाले कोमोरेटिव होते हैं। टिकटों की सीरीज तत्कालीन गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी के दफ्तर भेजी गई। गवर्नर जनरल कार्यालय ने इसे लिफाफों पर चिपकाना भी शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने जब यह कहते हुए आपत्ति जताई कि स्मृति में जारी होने वाले स्टांप पर सर्विस शब्द नहीं लिखा जा सकता तब गवर्नर जनरल ने फौरन ऐसे डाक टिकट के चलन पर रोक लगा दी। इन्हें सुधार के लिए भेजा गया। हालांकि तब तक 13 डाक टिकट सरकारी उपयोग में लाए जा चुके थे। अब जिनके पास भी ऐसे टिकट हैं वह बेशकीमती हैैं।

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4.14 करोड़ में बिका चार टिकट का सेट सर्विस शब्द लिखे टिकटों की ब्रिटेन में अप्रैल 2017 में हुई नीलामी से इसकी कीमत का अंदाजा लगाया जा सकता है। डाक टिकटों का संग्रहण करने वाले डीलर स्टैनली गिबन्स ने पांच लाख पाउंड (तब भारतीय मुद्रा में 4.14 करोड़ रुपये) की बोली लगाकर इसे खरीदा। उनका कहना था कि यह डाक टिकट अनोखा है और भारत का सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण व पसंदीदा।

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संगमनगरी से भी है नाता जार्जटाउन निवासी अनिल रस्तोगी डाक टिकटों के अलावा अन्य दुर्लभ सामग्री संग्रहीत करते हैैं। उन्होंने बताया कि जो डाक टिकट बिना सर्विस शब्द वाले थे, चलन में बने रहे। ऐसा डाक टिकट आज भी उनके पास है। जिनके पास सर्विस शब्द और सुधार के बाद छापे गए डाक टिकट हैं उनकी कीमत आंकना मुश्किल है।

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स्टांप टिकट कई मायने में महत्वपूर्ण यह डाक टिकट कई मायनों में अहम था। एक तो कीमत काफी थी। साथ ही तीन भाषाओं ङ्क्षहदी, अंग्रेजी और उर्दू में नाम लिखा गया था। रोचक यह भी है कि भारतीय डाक के किसी भी टिकट पर पहली और आखिरी बार उर्दू में नाम छपा था।

डेस्क रिपोर्ट

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