मोर के विषय मे रोचक जानकारी

सतना न्यूज़ डेस्क 24 अगस्त 2020। मोर दुनिया भर में सबसे सुंदर पक्षियों में से एक माना जाता है। इसे पक्षियों का राजा भी कहा जाता है। अपने सिर पर मुकुट के समान बनी कलगी और रंग-बिरंगी इंद्रधनुषी सुंदर तथा लंबी पूंछ से यह जाना जाता है। आंख के नीचे सफेद रंग, चमकीली लंबी गर्दन इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं। बारिश के मौसम में बादलों से भरे काले आकाश के नीचे जब यह अपने पंख शानदार तरीके से फैलाकर नृत्य करता है, तो कई मोरनियों के दिलों पर राज करता है। मोर के इन्हीं गुणों के कारण भारत सरकार ने 26 जनवरी 1963 को इसे राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया।

यह माना जाता है कि मोर सबसे पहले भारत, श्रीलंका और उसके आसपास के देशों में पाए गए, जिन्हें भारत में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान अंग्रेज पूरी दुनिया में ले गए। आज मोर की मुख्य रूप से दो प्रजातियां पाई जाती हैं- नीला मोर भारत, नेपाल और श्रीलंका में और हरा मोर जावा, इंडोनेशिया तथा म्यांमार में पाया जाता है। इसके अलावा अफ्रीका के वर्षावनों में कांगो मोर भी मिलते हैं।

भारत में मोर हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, वृंदावन और तमिलनाडु में ज्यादा पाए जाते हैं। मोर दुनिया भर में उड़ने वाले विशाल पक्षियों में से एक है। नर मोर की लंबाई उसकी पूछ सहित लगभग साढ़े 5 फीट तक होती है, जिसमें उसकी पूंछ ही उसकी कुल लंबाई की तकरीबन 60 प्रतिशत होती है। ऊंचाई के हिसाब से देखा जाए तो आमतौर पर मोर 2 फीट ऊंचे होते हैं, लेकिन जब वे अपने पंख फैलाते हैं तो उनकी ऊंचाई बढ़ जाती है।

एक वयस्क मोर का वजन 4 से 6 किलोग्राम होता है, जबकि मोरनी नर मोर से काफी छोटी, तकरीबन 1 मीटर लंबी होती है। मोर का वैज्ञानिक नाम पावो क्रिस्टेटस (लिनिअस) है। इसे अंग्रेजी में ब्ल्यू पीफॉल या पीकॉक और संस्कृत में मयूर कहते हैं।

मयूर परिवार में मोर एक नर है और मादा को मोरनी कहा जाता है। इनमें मोर आकार में अधिक बड़े और आकर्षक होते हैं। इसका शरीर चमकदार नीले रंग का होता है, जबकि मोरनी का शरीर ब्राउन रंग का होता है और उनके पास मोर के समान आकर्षक पूंछ नहीं होती। मोर की 200 लंबे-लंबे पंखों वाली शानदार पूंछ होती है, जिस पर नीले-लाल-सुनहरी रंग की आंख की तरह के चंद्राकार निशान होते हैं। ये अपनी पूंछ धनुषाकार में ऊपर की ओर फैलाकर नाचते हैं।

नाचते समय परों के मेहराब पर ये निशान बहुत अधिक मनमोहक लगते हैं। बारिश होने से पहले नर मोर नाचना आरंभ कर देते हैं। ऐसा माना जाता है कि मोरों को बारिश का पूर्वाभास हो जाता है और वे खुशी में नृत्य करते हैं। मोर कई बार मोरनी के साथ रोमांटिक नृत्य भी करते हैं। ऐसा माना जाता है कि मोरनियां मोर के आकार, रंग और पूंछ की सुंदरता से बहुत आकर्षित होती हैं। मोर को गर्मी और प्यास बहुत सताती है, इसलिए नदी किनारे के क्षेत्रों में रहना इसे भाता है। मोर बहुविवाही हैं और एक समय में वे 6 मोरनियों के साथ समूह बना कर रहते हैं। ये अकसर घनेरी झाड़ियों के बीच जमीन पर घोंसला बनाते हैं, जिन्हें ये पत्तियों और डंडियों से बनाते हैं। रात को ये घने पेड़ों की डालियों पर खड़े-खड़े ही सोते हैं।

मोरनी साल में जनवरी से अक्टूबर के बीच अंडे देती है। एक बार में वह 3 से 5 अंडे देती है। अंडा देने से बच्चों के परवरिश तक की जिम्मेदारी अकेले मोरनी की ही होती है। अंडे से चूजे निकलने में 25 से 30 दिन लगते हैं। बचपन में नर और मादा मोर की पहचान मुश्किल होती है। एक साल का होने के बाद ही नर की पूंछ लंबी होने लगती है। मोर के बच्चों के थोड़ा बड़े होने पर उनके सिर पर कलगी आती है। एक मोर औसतन 20 साल जिंदा रहते हैं।

मोर मुख्य रूप से घास-पात, ज्वार, बाजरा, चने, गेहूं, मकई जैसे अनाज खाते हैं। यह बैंगन, टमाटर, प्याज जैसी सब्जियां भी खाते हैं। अनार, केला, अमरूद आदि भी इसके प्रिय भोजन हैं। मोर कीड़े-मकोड़े, चूहे, छिपकली, सांपों आदि को भी चाव से खाते है। ये सांपों के सबसे बड़े दुश्मन हैं। कहावत है कि जहाँ मोर की आवाज सुनाई पड़ती है, वहां नाग भी नहीं जाता।

मोर भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान रखते हैं। इन्हें न केवल धार्मिक तौर पर बल्कि संसदीय कानून ‘भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972’ के तहत सुरक्षा प्रदान की गई है। मोर का महत्व भारत की संस्कृतियों से जुड़ा है। बहुत पहले प्राचीन हिंदू धर्म में इंद्र की छवि मोर के रूप में चित्रित की गई थी। भगवान कृष्ण तो अपने सिर पर मोरपंख लगाते थे। दक्षिण भारत में मोर भगवान कार्तिकेय के वाहन के रूप में जाना जाता है। विभिन्न इस्लामी धार्मिक इमारतों की नक्काशी के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता था। कई पुरानी इमारतों में आज भी इस तरह के डिजाइन वाले काम देखे जा सकते हैं।

ईसाई धर्म में भी मोर का विशेष स्थान है। इसे पुनरुत्थान का प्रतीक भी माना जाता रहा है। इसके अलावा भरतनाट्यम जैसे शास्त्रीय नृत्य मोर के नृत्य की तर्ज पर होते हैं, इसलिए हमारी भारतीय संस्कृति में मोर का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। मोर को सुंदरता के साथ-साथ शुभ का प्रतीक भी माना जाता है।

डेस्क रिपोर्ट

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