सतना

संकट देख गायब हुए समाजसेवी

व्यंग समझे या हकीकत, हालात ऐसे ही है ?

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सतना – रोज नेत्रदान की विज्ञप्ति छपवाने , पौधरोपण की तस्वीरें छपवाने ,रैली जुलूस में भोजन के पैकेट ,पानी के पाउच ,नाश्ता ,शर्बत बांटने को उल्लेखनीय उपलब्धि बना कर अपना प्रचार प्रसार करने वाले , झाड़ू लगा कर सब कुछ साफ कर देने का दावा करने वाले ,समाज के ठेकेदार बन कर बड़े बड़े उपदेश देने वाले लोग इस विश्व व्यापी आपदा के समय गायब हैं। अब समाज सेवा का प्रपंच भूल गया ,कोई भी अभी तक एक मास्क बांटने तो दूर लोगों से अपील करते तक नही नजर आया। जबकि यहां राष्ट्रीय से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक की समाजसेवी संस्थाएं वर्ष भर अपना प्रचार करती रहती हैं। लोग अपने नाम के आगे वरिष्ठ समाजसेवी लिखते रहते हैं। सैकड़ों की तादाद में सामाजिक संगठन भी हैं जो जात पांत का ,वर्ग का बीज भी साल भर बोते और उसे पालते पोसते रहते हैं लेकिन इस समय कोई अपने समाज के भी लोगों के लिए आगे आ कर खड़ा होता नही दिख रहा । कोई यह समझाइश तक नही देना चाहता कि लॉक डाउन उनके अपने लिए हैं ,उनके अपनो के लिए है इसलिए इसका पालन करें,घर से बाहर न निकलें।

 

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कुछ इसी तरह सीएसआर मद से बड़े बड़े एहसान का दावा कर धन को काला सफेद करने वाले उद्योगपति और व्यापारी भी इस मुश्किल दौर में कहीं खड़े दिखाई नही दे रहे। सतना,रीवा, सीधी और सिंगरौली को खोखला करने वाले ,अपनी तिजोरी भरने वाले उद्योगपति और यहां के बड़े व्यापारी इस समय अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वहन बेहतर कर सकते हैं लेकिन ऐसा न कर वे उस संदेह को पुष्ट ही कर रहे हैं कि सीएसआर में सिर्फ काले को सफेद करने का ही खेल किया जाता है बाकी समाजसेवा कागजों में ही सीमित रहती है।

AAD

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