चुनावी -चौपालमध्यप्रदेशसतना

कुर्सी की चाहत मे अपनो की बलि ….

फिलहाल अपने निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उम्मीदो पर पानी फेरकर गैरों के सहारे खड़ी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौति पार्टी के अपने उन नेताओं को समझाने और बुझाने की है जिनके राजनैतिक भविष्य पर खतरा मंडरा रहा है ।

Dr Anuj Pratap Singh
JANTA
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उल्लेखनीय है कि ग्वालियर संभाग की सोलह सीटों के अलावा बाकि की अन्य सीटो पर होने वाले उपचुनाव मे बीजेपी ने उन सभी को उम्मीदवार बनाया है जो सिंधिया के साथ कांग्रेस छोडकर बीजेपी मे शामिल हुये थे । दिक्कत यह है कि ये वही लोग है जिन्होने 2018 के चुनाव मे बीजेपी के प्रत्याशियों को हराया था और अब उपचुनाव मे यही लोग बीजेपी के उम्मीदवार है बहरहाल इतिहास इस बात का गवाह है कि जब जब बाहर के नेताओं को बीजेपी ने अपनी गोद मे बैठाया है तब तब पार्टी ने अपने ही किसी कार्यकर्ता को गर्त मे ढकेला है

विंध्य गवाह है

यूं तो विंध्यप्रदेश समाजवादियों का गढ रहा है लेकिन बाद मे यहां कांग्रेसियों का दबदबा कायम हो गया था जनसंघ का राजनैतिक दिया कभी जगमगाता और कभी कांग्रेस की आंधी मे बुझ जाता । यह स्थिति तब तक बनी रही जब तक कि बीजेपी को दूसरे दलों के नेताओं का साथ नही मिला था लेकिन जहाँ दूसरी पार्टियों के नेताओं के आने से बीजेपी मजबूत हुई वही बीजेपी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की राजनैतिक पहिचान ही खत्म हो गई । रीवा मे नागेंद्र सिंह (गुढ) , मैहर मे नारायण त्रिपाठी अमरपाटन मे रामखिलावन और सतना मे गणेश सिंह की वजह से ना जाने कितने ही भाजपाईयों का राजनैतिक भविष्य अंधकार मय हो गया है ।

आज नारायण त्रिपाठी पूर्व कांग्रेसी के कारण मैहर मे मोतीलाल तिवारी का कोई वजूद नही बचा है जबकि इसी तरह से हर्ष सिंह की वजह से रामपुर मे प्रभाकर सिंह की भी कोई एहमियत नही रह गई है कहने का तात्पर्य यह है कि बीजेपी कार्यकर्ताओं की सियासी जमीन पर वे लोग काविज हो गये है जो कभी बीजेपी की जड़ों मे मठ्ठा डालने का काम किया करते थे.

अब देखना यह है कि अपनी सियासी जमीन बचाने के लिये बीजेपी के लोग उपचुनावो मे क्या रुख अपनाते है

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