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SATNA लिलजी की लीज निरस्त होने से होगा फायदा – संजय सिंह तोमर

सतना 27 सितंबर । “लिलजी बाँध की भूमि पर स्वीकृत चार उत्खनन लीज निरस्त किये जाने संबंधी कल सतना कलेक्टर द्वारा दिया गया फैसला स्वागतयोग्य और राहत देने वाला है। इससे इस इलाके की खेती और जनता के समक्ष उत्पन्न खतरे को काफी हद तक टाला जा सकता है।” पिछले दस वर्षों से लिलजी बाँध की तलहटी में बसे 12 गाँवों के हजारों परिवारों के हितों के लिए संघर्ष कर रहे अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व राज्य सचिव बादल सरोज तथा लिलजी बाँध विस्थापन विरोधी आंदोलन के नेता बीरेंद्र सिंह मढ़ा ने उम्मीद जताई है कि बात सिर्फ यहीं तक नहीं रुकेगी और इस पूरे मामले को तार्किक समाधान तक पहुंचाया जाएगा।

Dr Anuj Pratap Singh
JANTA
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अंधाधुंध उत्खनन और बेतरतीब तथा अराजक सीमेन्ट कारखानों के चलते इस इलाके की खेती और नागरिक पहले से ही अत्यंत गंभीर असुरक्षा की स्थिति में पहुँच। कुछ वर्ष पहले संसद में प्रस्तुत एक रिपोर्ट के अनुसार अनूपपुर से लेकर सिंगरौली तक के विंध्य के 7 जिले न्यूमोकोनियोसिस (फैफड़ों को नुक्सान पहुंचाने वाले एक गंभीर रोग) से देश भर में सबसे ज्यादा प्रभावित थे। इसकी वजह कोयला, सीमेन्ट बिजली उद्योगों का प्रदूषण तथा जंगलों की तबाही थी। पांच साल पहले सीपीएम की पहल पर हुए एक अध्ययन के मुताबिक़ रीवा और सतना के सीमेंट प्लांट्स के चलते खेती के उत्पादन में 35% तक कमी पाई गयी थी। भूजल का स्तर खतरनाक स्तर तक नीचे चला गया था। इस बर्बादी को कहीं न कहीं रोका जाना चाहिए – सतना कलेक्टर का फैसला इस मामले में अच्छा कदम है। इसे भविष्य के लिए भी स्थायी आदेश में बदल दिया जाना चाहिए। ताकि निहित स्वार्थ के चलते कोई प्रशासनिक अधिकारी सारे नियमों की अनदेखी कर दोबारा इस तरह के लीज आवंटन न कर सके। इस नए आदेश ने किसानों की आपत्तियों को सही करार दिया है – इसलिए यह बेहतर होगा कि जिस कलेक्टर ने यह गैर कानूनी अनुमति देने का भ्रष्ट आचरण किया था उसके विरुध्द जांच तथा विभागीय कार्यवाही भी आरंभ की जाए।

माकपा ने इसी के साथ लिलजी बाँध की भूमि पर खेती कर रहे किसानों के अधसुलझे मामले के निबटान की भी मांग की है। ज्ञातव्य है करीब 11 वर्ष पहले भाजपा सरकार से जुड़े कुछ प्रभावशाली लोगों ने सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर करवाकर अपनी एक बेनामी फर्म के नाम लिलजी बाँध की उस समूची जमीन की लीज पत्थर खुदाई तथा सीमेन्ट कारखाने के नाम करा ली थी जिस पर कैमार, बड़हरी, कोठार, लिलजी, झिरिया वाजपेइहान, झिरिया कोपरिहान, झिन्ना, बेला, मढ़ा, कैशोरा, पगरा, पैपखरा गाँवों के किसान पीढ़ियों से खेती कर रहे थे और बसे हुए थे।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, किसान सभा तथा लिलजी बाँध विस्थापन विरोधी समिति ने लम्बी लड़ाई लड़कर उस लीज को रद्द किये जाने की घोषणा के लिए स्वयं मुख्यमंत्री को विवश किया था। इस संघर्ष में तत्कालीन सांसद तथा सीपीएम पोलिट ब्यूरो सदस्य #बृन्दा_करात भी लिलजी पहुँची थी। इसके बाद सरकार को ऐसी भूमियों के स्वामित्व कब्जाधारियों को देने के बारे में संशोधन करना पड़ा था। मगर खेद का विषय है कि कब्जाधारियों को पट्टे अभी तक नहीं मिले हैं।

माकपा के वरिष्ठ नेता गिरिजेश_सिंह_सेंगर तथा लिलजी बाँध विस्थापन विरोधी आंदोलन के नेता बीरेंद्र सिंह ने शीघ्र यह काम पूरा किये जाने की जरूरत बताई है। जल्द ही इस मामले में किसानो का एक बड़ा सम्मेलन आयोजित किया जाएगा

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