FEATUREDमध्यप्रदेश

उत्पादन लागत मूल्य कम किये बगैर खेती लाभ का धंधा कैसे बनेगी ….

मानो या ना मानो…….उपचुनावों से पहले पूर्व सी एम कमलनाथ किसानो की कर्जमाफी का प्रमाण लेकर आ गये तो बीजेपी ने कमलनाथ की पेन ड्राइव को ही फर्जी ठहरा दिया अब सवाल यह उठता है कि आखिर किसानो की माली हालत को लेकर कौन कितना संजीदा है लिहाजा थोडा पीछे चलते है तो पाते हैं कि खेती को लाभ का धंधा बना देने का उनका दावा यूं तो हकीकत से कोसों दूर था , मगर बावजूद इसके सूबे के किसान यह मानकर चल रहे थे कि देर सबेर ही सही , मगर कभी ना कभी शिवराज सरकार कृषि उत्पादन लागत मूल्य कम करने की दिशा मे कोई ना कोई ठोस कदम जरूर उठायेगी और हो सकता है कि तब उनकी खेती भी लाभ का धंधा बन जायेगी

Dr Anuj Pratap Singh
JANTA
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लेकिन लंबे इंतजार के बाद जब सरकार की तरफ से किसानों के हित मे कोई सार्थक पहल नहीं हुई तब थके हारे निराश किसानों ने मौत को गले लगाना ही ठीक समझा और कर्ज के बोझ से दबे किसान आत्महत्या करने लगे …. यद्यपि समस्या के समाधान के लिये उनका यह कदम किसी भी दृष्टि से उचित नही था परंतु मरता क्या ना करता , खेती मे हो रहे लगातार घाटे से परेशान और शिवराज सरकार की वायदा खिलाफी से हैरान किसानों के सामने फकत दो ही रास्ते थे पहला यह कि वे खेती किसानी को छोड़कर कोई और दूसरा काम अपना लें या फिर उत्पादन लागत मूल्य का डेढ गुना लाभांश लेने की खातिर आंदोलन की राह पकड़ लें,

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कुल मिलाकर विषम परिस्थितियों मे भी प्रदेश के किसानो ने घाटे की खेती का साथ नहीं छोड़ा लेकिन इस बीच उन्होंने अपनी जायज मांगो को लेकर आंदोलन की राह जरूर पकड़ ली , लेकिन इस आंदोलन से भी उन्हे कुछ हासिल नही हुआ बल्कि उल्टे शिवराज सरकार ने मंदसौर मे गोली चलवाकर किसानों के आंदोलन को सख्ती से दबा दिया था और बाद मे व्यापक विरोध के बावजूद भावांतर योजना भी थोप दी ग ई थी मजे की बात यह है कि अब बीजेपी का कोई भी नेता उसकी चर्चा तक नही करता है

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हालांकि जब तब नाराज अन्नदाता को बहलाने , फुसलाने और बरगलाने की कोशिशें होती रहीं मालुम हो कि उन दिनो मुश्किल दौर से गुजर रहे किसानो को एक गीत सुनाकर यह भरोसा दिलाया जाता था कि जब किसान का बेटा शिवराज उनके साथ है , भला तब डरने की क्या बात है , सूखे और ओलो की मार से आहत किसानों को हर संभव मदद करने का भरोसा भी दिया जाता था , जाहिर है कि यह सब महज 2018 के चुनावी साल को ध्यान मे रखकर किया जा रहा था , क्योंकि किसानो का गुस्सा शिवराज को एक बड़े संकट मे डाल सकता था , और तब हुआ भी यही था सूबे के किसान शिवराज के झांसे मे नही आये और किसान कर्ज माफी के चक्कर मे कांग्रेस के साथ जाकर खड़े हो गये

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यद्यपि उनकी कर्जमाफी का मसला अभी भी फंसा हुआ है इधर कांग्रेस की सरकार चली गई है और उधर वायदा खिलाफी से कथित तौर पर नाराज सिंधिया बीजेपी की गोद मे जाकर बैठ गये बहरहाल कांग्रेस के वचन पत्र को पूरा कराने के लिये सड़क पर उतरने का दम खम रखने वाले सिंधिया अब किसानो की कर्ज माफी को लेकर कोई बात तक नही करते है – – – आगे किसान जाने

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