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क्या है होलिका दहन का मुहूर्त और कौन सा रंग है आप की राशि में शुभ

प्रतीकात्मक तस्वीर

लौकिक व्यवहार में प्रमुख भाई चारे का प्रतीक भारतीय पर्व होली (holi) की तैयारी यूं तो एक पखवाड़े पहले से ही शुरू हो जाती है, लेकिन माना जाता है कि इस पर्व की शुरुआत होलिका दहन से होकर रंग पंचमी अथवा बुढ़वा मंगल तक चलती है। शास्त्रों के अनुसार फाल्गुन षुक्ल पूर्णिमा को होली के नाम से जाना जाता है। उमंग एवं रंगों के अद्भुत मेल का यह पर्व सामान्यतः 28 फरवरी से 28 मार्च के मध्य होता है। भारतीय ज्योतिष की गणनाओं के आधार पर विक्रम संवत 2076 षक संवत 1941 ईष्वी सन् 2020 फाल्गुन षुक्ल पूर्णिमा तदानुसार 9 मार्च सोमवार को होलिका दहन षास्त्र सम्मत होगा तथा धुरेडी 10 मार्च मंगलवार की होगी।
होली की धार्मिक महत्व की जानकारी देते हुये माँ षारदा की पवित्र धार्मिक नगरी मैहर के प्राख्यात वास्तु एवं ज्योतिर्विद पं. मोहनलाल द्विवेदी ने बताया कि होली लौकिक व्यवहार में प्रमुख भारतीय त्योहार होने के साथ साधना की दृष्टि से भी विषेष तांत्रोक्त -मंत्रोक्त सिद्धमय महापर्व है। षिव महापुराण के अनुसार भगवान षिव ने प्रथम बार अपना तीसरा नेत्र फाल्गुन षुक्ल पूर्णिमा के दिन ही खोला था। और कामदेव को भस्म कर दिया था। तांत्रिको/साधकों को साधना हेतु इस दिन का इंतजार बड़ी बेसब्री से रहता है।

Dr Anuj Pratap Singh
JANTA
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……… तो जायेगी नेताओं की कुर्सी

पं. द्विवेदी ने बताया कि यदि होली को पूर्व दिषा की ओर की हवा चले तो राजा एवं प्रजा सुखी अर्थात पूरे राज्य में सुख षांति होगी। दक्षिण की ओर हवा चले तो राज्य की सत्ता भंग और षासन पक्ष को परेषानी, पष्चिम दिषा की ओर हवा चले तो तृण एवं सम्पत्ति बढ़ेगी, उत्तर की ओर हवा चले तो धान्य की वृद्धि तथा यदि होली का धुआं आकाष की ओर सीधा जाये तो राजा का गढ़ टूटेगा अर्थात राज्य के बड़े नेताओं की कुर्सी जायेगी यह त्योहार ईसा पूर्व से मनाया जाता है। जिस लड़की का विवाह जिस वर्ष हुआ हो वह उस वर्ष अपने ससुराल की जलती हुई होली को न देखे। यदि हो सके तो अपने मायके चली जाये।

इतिहास में होली

होली के प्राचीनता के संबंध में पं. द्विवेदी बताते है कि सातवी षताब्दी में विरचित रत्नावली नाटिका में महाराजा हर्ष ने होली का बडा़ ही सुन्दर वर्णन किया है। वात्सायन महर्षि ने अपने कामसूत्र में होलाक नाम से इस उत्सव का उल्लेख किया है। 11 वीं षताब्दी में मुस्लिम पर्यटक अल्बरूनी ने अपने इतिहास में भारत में होली के उत्सव का उल्लेख किया है। वेद तथा पुराणों से,सम्पूर्ण साहित्य से भी होली के प्रचलन का पता चलता है जैमनी सूत्र के रचयिता ने अपने ग्रंथ में होलिकाधिकरण नामक एक स्वतंत्र प्रकरण लिखकर होली की प्राचीनता को प्रदर्षित किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिन्दु ही नही मुसलमान भी मनाते है। सबसे ज्यादा प्रामाणिक है मुगलकाल के होली के किस्से। अकबर का जोधाबाई के साथ तथा जहांगीर का नूरजहां के साथ होली खेलने का वर्णन इतिहास में मिलता है। अकबर संग्रहालय के एक चित्र में जहांगीर को होली खेलते हुये दिखाया गया है। षाहजहां के समय में होली को ’’ ईद-ए-गुलाबी’’ या ’’आब-ए-पाषी’’ कहा जाता था। मुगल बादषाह बहादुरषाह जफर के समय में अनेक मंत्री उनको रंग लगाने होली में अवष्य जाया करते थे। मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में दर्षित कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तृत वर्णन मिलता है।

होली के अध्यात्मिक एवं तांत्रिक दृष्टिकोण के संबंध में पं. द्विवेदी बताते है कि होली उमंग और उत्सव का त्योहार है। यह वह त्यौहार है जिसमें लोग अपनी पुरानी से पुरानी दुष्मनी एवं मन-मुटाव छोड़ कर एक दूसरे के गले मिल जाते है। और खुष होकर रंग व गुलाल से गिले-षिकवे मिटा लेते है। होली जहां एक ओर हर्ष व उल्लास का त्यौहार है वही दुसरी ओर आध्यात्मिक दृष्टि से भी इस पर्व का बहुत अधिक महत्व है। होली की रात्रि सिद्धिदायक रात्रि होती है, इस रात्रि में तंत्र-मंत्र एवं साधनाओं का विषेष रूप से रूझान होता है क्योंकि इस रात्रि में सम्पन्न की गई छोटी से छोटी साधना एवं प्रयोग भी जीवन को बदल देने में समक्ष है अर्थात रंग विहीन जीवन में रंग भरने में सक्षम है। यह पर्व नयी सिद्धियां हासिल करने का उत्तम अवसर है। एवं पुरानी सिद्धियों को षक्ति सम्पन्न बनाने का भी। ये उनके परीक्षा की घड़ियां होती है। इसमें भूल या त्रुटि उन्हें षारीरिक कष्ट तो पहंुचाती ही है तथा एक वर्ष का इंतजार भी करना पड़ता है। एक आम आदमी के लिये होली का त्यौहार रंग और उल्लास का त्यौहार है। यह मन-मुटाव और गिले-षिकवे मिटा कर भाईचारे का त्यौहार है, जो साधक अत्यधिक कठिनाईयों को झेलने के बाद भी सफलता नही प्राप्त कर पा रहे है। उन्हें होली की रात्रि में षीघ्र ही सफलता हेतु प्रयास करना चाहिये। यदि यह कहा जाये की होली की रात्रि तांत्रिक सिद्धियां प्राप्त करने की रात्रि ही है तो कोई अतिष्योंक्ति नही होगी। होली की रात्रि केवल साधकों एवं तांत्रिकों के लिए ही उपयोगी नही है, इस महत्वपूर्ण रात्रि का एक आम व्यक्ति भी लाभ प्राप्त कर सकता है।

राषि अनुसार जलाये होली

राषि के अनुसार होलिका दहन में लकड़ी अर्पण के संबंध में पं. द्विवेदी ने बताया कि दुष्ट षक्तियों और प्रवृत्तियों के अषुभ प्रभाव से बचने के लिए होली का पर्व सबसे अच्छा अवसर माना गया है। इस अवसर पर उंगुल भर की अपनी राषि के अनुसार निर्धारित लकड़ी का एक टुकड़ा होली को अवष्य अर्पित करें। यह कार्य होलिका के सात फेरे लगाते हुए करें।

राषि लकड़ी राषि लकड़ी
मेष और वृष्चिक वृष और तुला मिथुन और कन्या धनु और मीन खैर या खादिर गूलर
उपामार्ग
पीपल मकर और कुम्भ कर्क
सिंह शमी
पलाष
मदार

राषि के अनुसार खेले होली

राषि के अनुसार रंगो के प्रयोग मे संबंध मे पं. द्विवेदी बताते है कि जीवन को खुषनुमा और रंगीन बनाने के लिये राषि के अनुसार रंगों का प्रयोग करना चाहिये।

 

मेष:- आपका रंग लाल व नारंगी है। पीले रंग के सभी षेड्स भी आपके लिये बढ़िया है। इन रंगो के उपयोग से आपको षक्ती और स्फूर्ति मिलेगी।
वृषः– आपके लिये नीले काले और हरे रंग के सभी षेड्स उपयुक्त है। ये रंग आपको ऊर्जावान बनाये रखने मे सक्षम है।
मिथुनः– आपका रंग हरा हैं हरा रंग आपको तनाव मुक्त करने मे मददगार सावित होगा।
कर्कः– आपका रंग हैं क्रीम , जो कि चंद्रमा का रंग है। यह रंग आपकी मानसिक षक्ति बढ़ायेगा।
सिंहः आपका रंग नारंगी है एवं गुलाबी लाल पीले रंग के सभी ष्षेड्स आपके लिए
अच्छे है। ये रंग आपमें नया जोष और उमंग पैदा करने में सक्षम होंगे।
कन्याः हरा रंग आपके लिए ऊर्जा व संपन्नता दायक है। यह रंग आपके तनाव को दूर
करने में मदद करेगा।
तुला:- आपका रंग नीला , काला और हरा है। ये सभी रंग आपके लिये लाभकारी है।
वृष्चिक:- आपका रंग लाल है। लाल रंग आपके लिये ऊर्जादायक सिद्ध होगा।
धनु और मीनः– आपके रंग पीले और लाल खुद पर नियंत्रण रखने मे पीला रंग आपकी मदद
करेगा ।
मकर और कुम्भ:- काला नीला और बैगनी आपके रंग हैं। ये रंग आपके अनुकूल है।

होली के उपयोगी टोटकें

होलिका दहन के समय उपयोगी टोटकों की जानकारी देते हुए पं. द्विवेदी ने बताया कि नजर दोष या प्रेतबाधा से पीड़ित जातक के सिर से नारियल या नीबू को सात बार उतारकर होली मे डालने से बुरी आत्मा या नजर दोष का प्रभाव खत्म हो जाता है। बीमार व्यक्ति के सिर से सात गोमती चक्र सात बार उतार कर होली मे डालने से रोग या बीमारी से राहत मिल जाती है। होली की राख ताबीज मे भरकर धारण करने से किसी भी तरह के आंतरिक भय या आषंका से मुक्ति मिलती है। होली दहन के बाद बचे हुये कोयले से यंत्र या स्वास्तिक तैयार कर उसे गले मे धारण करना अत्यंत षुभकारी एवं लाभदायक माना जाता हैं ।

पूजन एवं दहन मूहूर्त

पं. द्विवेदी के अनुसार होलिका दहन के तीन नियम हैं – रात्रि का समय हो फाल्गुन षुक्ल पूर्णिमा तिथि हो एवं भद्रा व्यतीत हो चुकी हो। भद्राकाल मे होलिका जलाने से राष्ट्र मे विद्रोह होता है। तथा नगर मे अषान्ती होती है। प्रतिपदा चतुर्दषी तथा दिन मे भी होलिका दहन का विधान नही हैं। इस प्रकार का समय 9 मार्च सोमवार को पूर्णिमा र्तििथ रात्रि 11ः26 बजे तक है तथा भद्र दिन में ही 12ः32 बजे समाप्त हो चुकी है अतः तीनों निर्धारित नियमों के अनुसार फल्गुन शुक्ल पूर्णिमा तिथि में भद्रा के पश्चात् प्रदोष काल से लेकर निषा मुक्त रात्रि 11ः26 से पूर्व होलिका दहन का मुहुर्त निर्धारित किया जाता है।

आलेख .. पंडित मोहनलाल द्विवेदी — मैहर जिला सतना (mp)

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